जनता को थप्पड़ मारने का अधिकार तो नहीं देता हमारा संविधान
अमूमन शांत और चुपचाप रहने वाले मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले में हाल ही में हुए थप्पड़ कांड की गूंज अब देशभर में सुनाई दे रही है, जिले की एक शीर्ष महिला अधिकारी ने नागरिकता संशोधन कानून का समर्थन कर रहे लोगों में से एक को थप्पड़ जड़ दिया निश्चित ही जब यह सब घटित हुआ, उस एक क्षण में जन का आक्रोश, अधिकारी का इरिटेशन, देशभक्ति, कर्तव्य परायणता, जैसे तमाम मूल्य और कारण गिनाए जा सकते हैं, किंतु इन तमाम दलीलों के बीच भी सत्य यही है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही जनता को थप्पड़ मारने का अधिकार तो संविधान की कोई भी धारा, उपधारा या खंड नहीं देता, नतीजतन अब यह थप्पड़ जनता के गाल पर प्रशासन के तमाशे की तरह घूम रहा है
हैरत यह है कि कांग्रेसी मुख्यमंत्री कमलनाथ की अधीनस्थ उनके इशारे पर उन्हें खुश करने के लिए एक अधिकारी ने शांत जन समान्य को थप्पड़ जड़ दिए और यह सब तब हुआ जब जनता के हाथ में देश के समर्थन का प्रतीक तिरंगा था और होठों पर भारत माता की जय के नारे
वस्तुतः अधिकारीगण अक्सर अपने कठोर बर्ताव से इस प्रचलित कहावत को गलत साबित नहीं होने देते कि जिसकी लाठी उसकी भैंस अर्थात जिसकी सत्ता उसका अफसर के रूप में करते हैं किंतु इस सबके बीच प्रशासन के अधिकारियों के लिए यह दायरा तय है कि कम से कम वे जनता को सरेराह अपमानित तो ना करें
संभव है इस मामले में कई लोगों का नजरिया भी हो कि प्रशासन को कानून व्यवस्था संभालने के लिए कभी-कभी कठोर होना पड़ता है, निश्चित ही यह सही भी है, क्योंकि यदि कठोरता नहीं दिखाई जाएगी तो व्यवस्था बिगड़ते देर नहीं लगेगी
किंतु इन अफसरों की कठोरता तब कहां गुम हो जाती है, जब सड़कों पर बसें जलाने, तोड़फोड़ करने, लोगों को मारने पीटने, सरकारी संपत्ति को नुकसान, पहुंचाने वाली उग्र भीड़ सड़क पर उतरती है? और यदि सामान्य प्रदर्शन कर रही भीड़ को भी नियंत्रित करना है तो कानून आपको लाठी मारने का अधिकार देता है, किंतु थप्पड़? थप्पड़ मारने के बारे में तो न बाबा साहब अंबेडकर कुछ लिख गए हैं, न ही संविधान सभा के अन्य महानुभावों ने ऐसा कोई प्रावधान किया है
अतः सत्ता, प्रशासन, जनता से लेकर हर पक्ष को चाहिए कि वे अपने अधिकारों की मर्यादा में रहे, पक्ष यदि इसे तोड़ेगा, तो दूसरा पक्ष उग्र हो उठेगा !?!?!?!?!?

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