ईसाई नहीं बनने की सजा… 34000 वैष्णव हिंदुओं को अपने ही देश में 23 साल रहना पड़ा शरणार्थी बन कर!
16 जनवरी, 2020 को नई दिल्ली में भारत सरकार, त्रिपुरा और मिज़ोरम सरकार तथा ब्रू-रियांग (Bru-Reang) प्रतिनिधियों के बीच एक समझौता हुआ है। इस समझौते के अनुसार लगभग 34,000 ब्रू शरणार्थियों को त्रिपुरा में ही बसाया जाएगा। साथ ही उन्हें सीधे सरकारी तंत्र से जोड़कर राशन, यातायात, शिक्षा आदि की सुविधा प्रदान कर उनके पुनर्वास में सहायता प्रदान की जाएगी। अभी तक ब्रू नाम सुनते ही ब्रू (Bru) कॉफ़ी की एक ब्रैंड का ही चित्र सामने आता था परन्तु जानकार आश्चर्य हुआ कि ये एक जन-समुदाय है, जो अपने ही देश में गत 22-23 वर्षों से शरणार्थी के रूप में जीवन यापन कर रहे थे।
कैंपों के जीवन का अर्थ यह था कि उन्हें सभी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहना पड़ा। 23 वर्षों तक उनके पास न घर था, न जमीन, अपने परिवारों के लिए न चिकित्सा मिलती थी, न उपचार होता था और उनके बच्चों को अभी तक कोई शैक्षिक सुविधा प्राप्त नहीं हुई। ये किसी दूसरे देश से नहीं आए थे बल्कि अपने ही देश के अपने ही लोग हैं, जिनको अपने ही राज्य मिज़ोरम को छोड़कर त्रिपुरा में बसना पड़ा। कश्मीरी पंडितों जितनी ही दर्दनाक कहानी है ब्रू लोगों की। जिनको अपनी आस्थाओं, मान्यताओं के साथ समझौता न करने की कसौटी पर हर क्षण डर, हिंसा, अमानवीयता, मौत और अंततः पलायन करना पड़ा।
आखिर कौन हैं ये ब्रू ? भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के मूल निवासी रिआंग (Bru or Reang) जन-समुदाय जो मुख्यतः त्रिपुरा, मिज़ोरम, असम तथा बांग्लादेश के चटगाँव पहाड़ी क्षेत्र में रहते हैं। रियांग समाज वैष्णव हिन्दू हैं। मिजोरम में मिजो के बाद अल्पसंख्यक समुदायों में रिआंग-ब्रू लोगों की संख्या सबसे अधिक है। कृषि उनका मुख्य व्यवसाय है तथा अत्यन्त राष्ट्रवादी हैं, इनकी संस्कृति काफी उन्नत एवं परिष्कृत है। मिजोरम में मिज़ो बहुसंख्यक हैं अत: अपना सर्वाधिपत्य स्थापित करने के लिए सभी को मिजो/ईसाई बनाना चाहते हैं।
रियांग अपनी संस्कृति के उपासक तथा धर्म में अटूट विश्वास रखने वाले हैं, अतः वे इस मिजोकरण के लिए तैयार नहीं हुए। दोनों की संस्कृति, भाषा, वेशभूषा तथा धार्मिक मान्यताओं आदि में अंतर होने के कारण मिज़ो ने रियांग को “ब्रू” नाम दिया और यह जन-धारणा विकसित कि ब्रू यहाँ के मूल निवासी नहीं है। मिजोकरण, ईसाईकरण तथा चर्च प्रायोजित धर्म-परिवर्तन को स्वीकार न करने के कारण मिज़ो इनके खिलाफ रहते हैं। इसी कारण दोनों में तनाव बना रहता है।
सुनियोजित भेदभावपूर्ण नीति का प्रयोग कर उन्हें न केवल अलग-थलग कर दिया गया, बल्कि उन्हें जंगलों से जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करने से भी रोका गया, उन्हें राशन से वंचित कर दिया और उनके बच्चों को स्कूलों से बाहर रखा। परिणाम यह है कि वे अपने मौलिक अधिकारों का प्रयोग करने से लगातार वंचित रहे हैं। राज्य प्रायोजित हिंसा का परिणाम यह रहा कि रिआंग को मिजोरम से विस्थापित होकर त्रिपुरा तथा अन्य राज्यों में अस्थायी शिविरों में शरण लेनी पड़ी।
ब्रू और मिज़ो समुदाय के बीच संघर्ष का पुराना इतिहास रहा है। 1990 के दशक में, रिआंग ने अपने ऐतिहासिक उत्पीड़न और राजनीतिक बहिष्कार को व्यक्त करते हुए, अपनी तीन मांगे रखीं- 1) ऑल इंडिया रेडियो, आइज़ॉल में रिआंग-ब्रू कार्यक्रम को शामिल करना 2) सरकारी सेवाओं में उनके लिए नौकरियों का आरक्षण 3) विधान सभा में उनके प्रतिनिधियों का नामांकन और रिआंग-ब्रू के लिए एक स्वायत्त जिला परिषद का निर्माण।
मजे की बात यह है कि हालांकि मिज़ोरम में रिआंग-ब्रू दूसरी सबसे बड़ी आबादी है, बावजूद इसके एडीसी के लिए उनकी माँग अनसुनी हो गई । वर्ष 1995 में ब्रू समुदाय द्वारा स्वायत्त ज़िला परिषद की माँग और चुनावों में भागीदारी के अन्य मुद्दों पर ब्रू और मिज़ो समुदाय के बीच तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। सितंबर 1997 में, बीएनयू ने मिज़ोरम के पश्चिमी बेल्ट में संविधान की छठी अनुसूची के अनुसार रिआंग के लिए उसी स्वायत्त जिला परिषद (एडीसी) की माँग करने के लिए एक प्रस्ताव अपनाया। इस माँग के खिलाफ मिजो की प्रतिक्रिया ने बड़े पैमाने पर हिंसा को भड़का दिया। उनकी माँग को न केवल मिज़ो समुदाय के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने खारिज किया, बल्कि उनकी माँगों को दबाने के लिए उनके खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा की।
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